करुणा मूलक आधार पर नौकरी की गुहार करने वालों का हिमाचल सरकार कर रही है शोषण

करुणा मूलक …
क्या होता है ये
करुणा मूलक ।
करूणा मूलक इस कलयुग में बन गया है करूणा का विषपान …
करुणा का संघार ।
करुणा का गला घोंट रहे हैं ये करुणा मूलक आधार पर नौकरी देने वाले अधिकारी । या ये कहें करुणा मूलक आधार पर नौकरी ना देने वाले ये अधिकारी ।
व्यवस्थाएं ऐसी की जैसे नियमों के आधार पर सब हो रहा है । और जब गिरेबान में झांक कर देखें तो दो तरह की व्यवस्थाएं । अफसरों और राजनीतिज्ञों के लिए अलग … आम जनमानस के लिए अलग ।
जी हां ये ही तो हो रहा है हर सरकारी कर्मचारी के साथ । जो बेचारा बिन मौत मारा गया लेकिन कभी सोचा नहीं था उसने उसके परिवार वाले ऐसे असाह महसूस करेंगे जब वो नौकरी में होते ही जान गवा देगा । ये ही साथी संगी … ऑफिस में साथ काम करने वाले सहकर्मी और जिनके लिए रात दिन मेहनत करते हैं ये ही अफसर नियमों का हवाला देकर पीछे लावारिस और बिन रोज़गार के बीवी बच्चों को सहारा देने से इंकार करेंगे ।
आज हिमाचल में हज़ारों ऐसे करुणा मूलक आधार पर नौकरी पाने वाले बच्चे या परिवार के सदस्यों को नकारा जा रहा है । दफ्तरों में बेइज्जत किया जा रहा है ।
क्या वो जिसका बच्चा , बीवी बहन , मां , बेटा या भाई जो दर दर ठोकर खाकर उसकी जगह नौकरी पाने की गुहार करते देख बिलख कर रुदन नहीं करता होगा जब उस अलग दुनिया से ये सब देखता होगा । अपने परिवार वालों को देखकर आंसू नहीं बहाता होगा ।
जिन्होंने करुणा करनी थी वो करुणा करने वाले निर्जीव होकर करुणा हिन कृत्य कर रहे हैं ।
चाहे वो ब्यूरोक्रेसी यानि अफसरशाही हो , प्रजातांत्रिक व्यवस्था के ठेकेदार राजनीतिज्ञ हों या फिर इस विषय पर निर्णय करने वाली नयायिक व्यवस्थाएं हों सब ने बस अपने हित साध लिए हैं ।
जब तो कोई अपना स्वर्ग सिधार जाए तो फट देकर नौकरी भी मिल जाती है परिजनों को , नियमों को ताक पर रख कर सुविधाएं भी मिल जाती हैं ।
हर तरह का सहयोग जो वांछित है उससे भी कहीं अधिक उपलब्ध हो जाता है । और जब अपने ही संस्थान में कोई कर्मचारी ना रहे , अकस्मात मृत्यु को प्राप्त हो तो उस बेचारे के परिजनों की एड़ियां घिस जाती हैं इनके दफ्तरों के चक्कर लगाते लगाते । लेकिन मजाल है जो इनके सिर पर जू भी रेंग जाएं ।
हम आहृवाहन करते हैं ऐसे सैंकड़ों परिजनों का जो बेचारे असहाय सरकार और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट काट कर टूट चुके हैं ।
जिनके पास बस बेबसी और लाचारी के अलावा कुछ नहीं । एक तो अपना कोई चला गया । उसके बाद जो सरकार या प्रशासन से अपेक्षा थी वो भी चकनाचूर हो गई ।
आप अपना अनुभव यहां साझा करें । हम आपको मंच प्रदान करेंगे अपनी व्यथा ज़ाहिर करने का । आप खुल के अपने अनुभव बताएं । किस किस तरह की पीड़ा आप झेल रहे हैं जब सरकारी नौकरी करुणा मूलक आधार
(On Compassionate grounds)
पर आप सब को नहीं मिल पा रही हिमाचल प्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों में ।
अगर आप आंकड़ों पर नज़र दौड़ाएं हज़ारों ऐसे पद हैं जो ख़ाली पड़े हैं अनेकों सरकारी विभाग , बोर्ड या कॉर्पोरेशन में । एक तरफ तो सरकार रोज़गार देने की बात करती है । लोगों को विभिन्न पदों में स्थान सुनिश्चित करने की बात करती है । लेकिन फिर भी हज़ारों पद वर्षों से ख़ाली क्यों पड़े हैं । जो भरे जा रहे हैं वो सिर्फ राजनीतिक आधार पर । जिसको लाभ देना हो वो तो आराम से सिफ़ारिश करवाकर कुर्सी पर ठाठ से बैठे हैं, बाकी बजाएं ठुन ठुना ।
मतलब रोज़गार भी उसको जिसकी ऊंची पहुंच है । जिसकी ऊंची पहुंच है वो तो पहले से ही ऊंचा है , संपन्न है । उसका क्या जो बेचारा एक रोज़गार के लिए ज़रूरी काबलियत और डिग्री लेकर दर दर भटक रहा है ।
आजकल लॉबी की बात बहुत जोरों पर है ।
चाहे वो बॉलीवुड लॉबी हो , अफसरशाही की लॉबी हो , राजनीतिज्ञों की लॉबी हो , यहां तक कि न्यायिक या मीडिया जगत की लॉबी हो ।
सिर्फ इन लॉबी वालों को ही क्यों सब संसाधन , सुविधाएं , विशेष दर्जा मिले । इनकी ही बात क्यों समाज में थोपी जाएं । बाकी सब सिर्फ सहने की लिए ही पैदा हुए हैं ।
ये एक बड़ा प्रश्न चिह्न है ।
अब आप सबको ही इस का उत्तर देना है ।
आप सब बेहिचक होकर अपने अनुभव बताएं ।
खासकर जिनके घर वाला कोई चला गया है और अब सरकारी नौकरी करुणा मूलक आधार पर नहीं मिल पा रही ।
सरकारी व्यवस्था / रेड टापिज्म ( Red Tapism) ने उन्हें खोखला बना दिया है ।
आप खुलकर अपनी व्यथा , पीड़ा , सरकारी विभागों के अनुभव साझा करें ।
ताकि सब जनमानस तक आपकी आवाज़ पहुंचे ।
सरकार के अधिकारियों और सिपेसलारहों के भी आसन डोलें ।
और हां एक सवाल ये भी तो बनता है जिनको इससे पहले करुणा मूलक आधार पर नौकरी मिली है वो क्या सब फर्जी हैं । क्यूंकि अब तो ये नियम लगा दिया गया है कि इनकम क्राइटेरिया में नहीं आते तो नौकरी नहीं मिलेगी । इससे पहले जितने कर्मचारी इनकम क्राइटेरिया से ऊपर के लगे हैं वो सब भी फिर अवैध होने चाहिए क्योंकि वो तो कई परिवार हमेशा ही धन्ना सेठ थे … आज भी हैं ।
कहने का अभिप्राय इतना सा है कि सिर्फ एक संख्या तक की आय निर्धारित कर कैसे किया जा सकता है की इस परिवार का भविष्य क्या होगा ।
ऐसे हज़ारों परिवार हैं जिनके एक सरकारी नौकरी में कमाई करने वाले सदस्य के मर जाने के बाद परिवार की स्थिति ऐसी हो गई के वे गरीबी के दलदल में फस चुके हैं ।
क्यूं क्यूंकि अफसर साहब या सरकार ने नौकरी नहीं दी जिसका वो परिवार वाला हकदार था ।
इस बात का जवाब है क्या किसी समाज के चिंतकों या सरकार के पास ।
कॉमेंट ज़रूर करें ।
इस विषय को जन आंदोलन बनाना होगा ।
क्यूंकि ये किसी व्यक्ति विशेष का नहीं ।
किसी अकेले का नहीं । पूरे समाज का है ।
हम सब का है ।
और ये एक पुण्य का काम होगा अगर हमारे प्रयास से जरूरतमंद पात्र लोगों को सरकारी नौकरी मिले ।
🙏

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